Wednesday, September 17, 2008

हिन्दुस्तान में सब चोर उचक्के हैं और चीन में सब ईमानदार!

विचारमंथन नाम के ब्लाग में आज चीन देश की ईमानदारी के बारे में एक सत्य (?) घटना पर आधारित एक कहानी छपी है कि कैसे चीन खूबसूरत है, वहां के बाशिन्दे खूबसूरत हैं, खूबसूरत ही नहीं है बेहद ईमानदार है, जमीन पर पड़ा 5 RMB का नोट नहीं उठाते जबकि इतनी धनराशि के लिये "अपने हिन्दुस्तान मे तो इतने पैसो मे कत्ल हो जाये, सरकारे गिर जाये और न जाने क्या-क्या हो जाये. "

बहुत से लोगों को अपनी साड़ी में लिपटी सिधी साधी मां की जगह पडौस की छमकछल्लो अधिक पसंद आती है. किसी गपोड़ शंख ने लिख दिया और भाई बिना सोचे बिचारे ले उड़े और छाप दिया. अब मौका मिला है तो गरिया दो अपने भारत को, हिन्दुस्तानियों को. कौन बेबकूफ जायेगा यह सब सत्यापित करने?

लेकिन भाई मेरे हिन्दुस्तान को गरियाने से पहले नेट पर जरा चीन के भ्रष्टाचार के बारे में पता तो कर लेते

यहां पर विश्व भाई ने लिखा है कि "किसी वर्ग को पूरी तरह दबाने के लिये जरूरी है उसका आत्मसम्मान खत्म कर देना. जब अपने लिये खुद के दिल में ही सम्मान न हो तो बहुत मुश्किल है किसी दूसरे के हाथों अपना अपमान रोकना." जब कोई अपना आत्मसम्मान खुद मिटा चुका हो तो इनका भगवान भी मालिक नहीं है.

आप जाने से पहले चीन की सड़कों पर क्या होता है, ये वीडियो देख लीजिये फिर खुद फैसला कीजिये कि क्या हिन्दुस्तान में सब चोर उचक्के हैं और चीन में सब ईमानदार. देखिये कि कैसे सड़कों पर बच्चों के खाने के टिफिन लुट जाते हैं, कैसे राह चलते लोगों के लुटाई होती है.




Robbery in China - Free videos are just a click away

मैंने विरोध स्वरूप उस ब्लाग पर तिप्पणी की थी जो माडरेट नहीं की गई इसलिये तल्ख शब्दों में यह पोस्ट लिख रहा हूं

मैं, मेरा देश, मेरे देशवासी भी उतने ईमानदार और बेईमान हैं जितने किसी और देश के, न वो स्वर्ग से उतर कर आये हैं न हम मोरी के कीड़े हैं.

8 comments:

ab inconvenienti said...

चीन तो जाना नहीं हुआ पर भारत में लोग कोई साधू-महात्मा नहीं रहे. वैसे चीन की बात पर भी विश्वास नहीं आता.

सौरभ कुदेशिया said...
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सौरभ कुदेशिया said...
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Shekhawat said...

यदि भारत जितनी आजादी चीन में हो तो पता चले ,वो तो डंडे का डर है चीन में वरना भारत से बीस गुना ज्यादा गंदगी ,बेईमानी मिलती | भारत तो फ़िर भी भारत ही है |

सौरभ कुदेशिया said...

"वो तो डंडे का डर है चीन में.."

शेखावत जी, डंडे का डर ही तो वजह होती है अनुशासन की. डंड़ा गायब तो अनुशासन उडन-छू.

सौरभ कुदेशिया said...

श्रीमान सुमो जी,

आपकी टिप्पणी का धन्यवाद. अच्छा लगा आपके विचार जानकर. समय की कमी के कारण आपकी टिप्पणी अप्रूव नही कर पाया, इसके लिये क्षमा याचना.

मै आपके विचारो से पूरी तरह से सहमत नही हूं. आपकी जगह अगर मै भी होता तो शायद ऐसे ही कुछ विचार मेरे भी होते इस लेख को पढ़ने के बाद. आपकी जानकारी के लिये बता देना चाहूंगा कि मै खुद एक शुध्द भारतीय हूँ पर पिछले 2-3 सालो से चीन मे काम करने के पश्चात पता पड़ा कि दोनो देश के नागरिक एक-दूसरे के बारे मे कितना कम जानते है. एक आम चीनी नागरिक भारत देश के बारे मे क्या सोचता है अगर मै आपको बताने बैठ जाउ तो शायद आप मुझे पागल ही करार देंगे. खैर, इस बारे मे चर्चा बाद मे.

इस लेख को लिखने का मेरा मकसद न तो किसी तरह से किसी देश-विशेष का महिमा-मंडन करना था और न ही अपनी मातृभूमि का किसी तरह से अपमान करना. घटना देखी, महसूस किया की इस घटना से हम सब कुछ सीख सकते है तो शब्दो मे उतार दी. घटना चीन मे हुई और मेरी आंखो के सामने हुई तो उसका नाम आना स्वभाविक था. आप चीन की जगह किसी और देश का नाम ले ले कोई फर्क नही पड़ता, सिर्फ इस लेख मे छुपे हुये सन्देश को समझ लिजियेगा.

इस लेख का यह मतलब यह कतई नही है कि सभी भारतीय बेईमान होते है और न यह कि सभी चीनी ईमानदार. इसका मतलब यह भी नही कि अगर कही कोई अच्छी बात सीखने को मिले तो हम अपना मुँह उस तरफ से सिर्फ इसलिये मोड़ ले क्योंक़ि वो आपके दुश्मन की तरफ से आई है. कोई अच्छा काम करें, चाहे अपने देश मे हो या कही और तो क्या उस तरफ से अपनी आंखे मूंद ले? हमारा बडप्पन इसमे नही कि हमने किस से सीखा वरन इस मे है कि क्या सीखा.

न मुझे अपनी मां कम पसंद आती है, और न मुझे पड़ोस की छमकछल्लो कुछ ज्यादा चटपटी नजर आती है. मां की स्थान दुनिया की किसी भी छमकछल्लो से कही ज्यादा ऊँचा होता है. वैसे भी हम दूसरे की थाली में अधिक घी ही क्यूं ढूंढे? क्या हम सामने वाले से सूखी-रोटी खाकर भी खुश रहने की कला नही सिख सकते? दूर के ढोल वकाई सुहावने होते हैं पर अपना ढोल सुरीला और दमदार करने से हम को किसी ने रोका है क्या?

उम्मीद है आपसे आगे भी चर्चा होती रहेगी. बहाना कुछ भी रहा हो, पर आपसे मिलने का सौभाग्य तो प्राप्त हुआ.

सुमो said...

सौरभ जी अपने तल्ख शब्दों के लिये माफी चाहता हूं.

आप चीन की बड़ाई करते तो कुछ फर्क नहीं था. दरअसल आपका "अपने हिन्दुस्तान मे तो इतने पैसो मे कत्ल हो जाये, सरकारे गिर जाये और न जाने क्या-क्या हो जाये. " कहना मुझे भी चुभ गया.
दो दिन पहले डा. प्रवीण चौपड़ा ने अपने ब्लाग पर लिखा था कि चीन बच्चों के दूध में मेलामाइन मिला रहा है जिससे सैकड़ों बच्चे मर रहे हैं और हजारों बीमार.

मेरा सिर्फ यही कहना है "मैं, मेरा देश, मेरे देशवासी भी उतने ईमानदार और बेईमान हैं जितने किसी और देश के, न वो स्वर्ग से उतर कर आये हैं न हम मोरी के कीड़े हैं."

सौरभ कुदेशिया said...

यकीन मानिये, लिखते हुये मुझे भी कम शर्म नही आ रही थी.

आपने सही कहा कि चीन मे सैकड़ों बच्चे दूध में मिले मेलामाइन से मर गये हैं और हजारों बीमार है. वाकई अफसोस जनक और निन्दनीय घटना है. पर उसके विपरीत एक घटना पर जरा गौर ड़ाले. अगर आपको याद हो तो कुछ समय पहले चीनी खिलौनो मे जहरीले पदार्थे पाये गये थे. (देखे: http://www.cnn.com/2007/WORLD/asiapcf/08/13/china.toymaker.ap/index.html), उस कम्पनी के मालिक ने इस वजह से शर्म से आत्मह्त्या कर ली थी कि उसकी वजह से उसके देश की इतनी बड़ी बेईज्जती हुई. क्या हम अरबो-खरबो के घोटाले कर रहे अपने किसी नेता या अधिकारी से ऐसी शर्म की उम्मीद कर सकते है? अब जरा इस खबर पर नजर ड़ाले http://delhicourts.nic.in/mar/1485.htm.

अगर आप मेरी पोस्ट के जबाब मे अपने ब्लोग पर चीन मे चोरी का विडियो न लगा कर, आपके साथ घटी भारत या दुनिया मे घटी किसी एक ऐसी घटना का वर्णन कर देते जिस पढकर कुछ और लोगो की दुनिया को अच्छा बनाने की लालसा जाग्रत होती तो उससे बेहतर जबाब क्या कोई होता? आजकल हर काम मे बुराई निकालना चुटकियो का काम है, असली मेहनत तो अच्छाई को सामने लाना और लोगों को उस पर यकीन दिलाना है. आईये, साथ मिलकर इस काम को अंजाम दे.